प्रेम अनुभूति का विषय है..इसीलिए इसकी अभिव्यक्ति की जरूरत सबको महसूस होती है.. अतः,अपनी मौलिक कविताओं व रेखाचित्रो के माध्यम से, इसे अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रहा हू मैं यहाँ.
रविवार, 24 मार्च 2019
शनिवार, 23 मार्च 2019
बसंत
दिन और अवधि के हिसाब से
हो जाता हैं अंत बसंत का
प्रत्येक वर्ष
लेकिन सच पूछो तो
बसंत छाया रहता हैं
एक उम्मीद की तरह
वर्षभर
हमारे अंदर
उसकी यादें
उसकी बातें
कहां बिसरा पाता हैं भूले से भी कोई
आखिर
कौन नही करना चाहता
उसकी प्रसंशा करना
और कौन नही चाहता
उसके बासंती रंगों में रँगना
सच पूछो तो
उसका जवाब नही
और जिसका जवाब नही
उसके बारे में
क्या कहना !
हर शब्द कम पड़ जायेगा
आखिर में.
कविता - रवीन्द्र भारद्वाज
चित्र - गूगल से साभार
शुक्रवार, 22 मार्च 2019
एकदिन ये भी हैं

सपने टूटें
शीशे जैसे
कि जुड़ना भी मुश्किल
तुम रूठे
पर्वत जैसे
कि बात करना भी मुश्किल
दूभर लगता हैं
सांस लेना
साँसों में
नाइट्रोज हो जैसे समायी
एकदिन वो भी था
जब हँस-हँसके
तुम बातें किया करती थी
मुझसे
और एकदिन ये भी हैं
कि शक्ल भी नही रास आ रहा तुमको मेरा
कविता - रवीन्द्र भारद्वाज
चित्र - गूगल से साभार
गुरुवार, 21 मार्च 2019
होरी आ गयों !


जोगी जी !
होरी आ गयों
मन भांग खा बौरा गयों
तुम बजाओ ढोलक
मैं बजाऊ झाल
होरी आ गयों ऊधो !
माधो का हैं बस इन्तजार
ब्रज में
अबीर, गुलाल धुपछईयां सा छा गयों
और गोपियाँ
साँवरा रंग छोड़
सब रंग नहा गयी
तुमहूँ नाँचो राधा प्यारी !
मीरा बैरन नाँची
श्याम खेलन अइहें होरी
उगे सूरज हुए
अभी
पहर एक
कविता - रवीन्द्र भारद्वाज
चित्र - गूगल से साभार
बुधवार, 20 मार्च 2019
हृदय में लगे चोट का उपचार नही
हृदय में लगे चोट का उपचार नही
सुबह-शाम टपकता रहता हैं
खून
वक्त भी सफल चिकित्सक नही होता
यादों और बातों की घाटी में
बहुरूपिये शिकारियों का राज हो जाता हैं
तुमको देख ' ला बेली डेम संस मर्सी '
का सा आभास होता हैं
कविता - रवीन्द्र भारद्वाज
चित्र - गूगल से साभार
मंगलवार, 19 मार्च 2019
सुबह खिली

सुबह खिली
फूल जैसी
खुशबू से उसके
तरो-ताजगी भरता
हर प्राणी
पंछी भौरे सा
बहके-बहके से
चहके हैं
मेरे अटारी.
कविता - रवीन्द्र भारद्वाज
चित्र - गूगल से साभार
सोमवार, 18 मार्च 2019
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
सोचता हूँ..
सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो बहार होती बेरुत भी सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना ज्यादा मायने नही रखता यार ! यादों का भी साथ बहुत होता...
-
बड़े ही संगीन जुर्म को अंजाम दिया तुम्हारी इन कजरारी आँखों ने पहले तो नेह के समन्दर छलकते थे इनसे पर अब नफरत के ज्वार उठते हैं...
-
सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो बहार होती बेरुत भी सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना ज्यादा मायने नही रखता यार ! यादों का भी साथ बहुत होता...
-
बेटी कल विदा होगी आज जश्न का माहौल हैं और ठुमक-ठुमककर नाँच रहा हैं बंदरवाला नाँच हरकोई हर कोई इस बात से अनभिज्ञ ...

