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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

वक्त-वक्त की बात है..


वक्त-वक्त की बात है..

कभी तुम अपने थे
अभी पराये हो

संगमरमर का बदन था
चेहरा गुलमोहर सा लाल था

लचक कमर की
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी थी.
रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज


सोचता हूँ..

सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो  बहार होती बेरुत भी  सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना  ज्यादा मायने नही रखता यार !  यादों का भी साथ बहुत होता...