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शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

ये दिल है कि मानता नहीं..!

शहर का गली-गली छाना
चप्पा-चप्पा ढूंढा तुम्हे
तुम नही दिखी..


लगता है
तुम चली गई हो
इस शहर से बहुत दूर


मगर
ये दिल है कि मानता नहीं..
कविता व रेखाचित्र - रवीन्द्र भारद्वाज

सोचता हूँ..

सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो  बहार होती बेरुत भी  सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना  ज्यादा मायने नही रखता यार !  यादों का भी साथ बहुत होता...