रविवार, 11 अगस्त 2019

नदी की गति तो देखो

नदी की गति तो देखो 
कि कितने कंकड़, रेत बह चले 
साथ उसके 

वो अपना पल्लू हमेशा ही झाड़ती रही 
फिरभी बधे रहे वो सबके-सब पल्लू से उसके

शायद गाँठ बांधी थी नदी
एक के अनुपस्थिति में 
दूसरे की 
दूसरे की 
पहले की अनुपस्थिति में

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

मेरे दोस्त !

एक समय था
वो थी 
मै था
और तुम थे मेरे दोस्त !

एक समय है ये भी 
वो अजनबी है
मै अभागा हूँ 
और तुम हो बेसहारा मेरे दोस्त ! 

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

सोमवार, 5 अगस्त 2019

नदी फिरभी नही समायी मुझमे

समन्दर था मैं

नदी फिरभी नही समायी मुझमे

दोनो बहे तो थे 
एक-दूसरे मे घुलने-मिलने के लिये 
लेकिन
उफ्फ, चट्टानों ने रास्ता बदल दिया
हमारा

घूम-फिरकर मिले भी तो 
तट भीगा 
केवल 
आँसुओ के फुहारों से 

और ऐसे मिलकर भी 
न जाने क्यों नही मिले फिरभी
हम-तुम

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

कोई तो रास्ता होगा

कोई तो रास्ता होगा 
जहाँ हम दिख जाये 
अचानक से
एक-दूसरे को 

और गले मिलकर
मिटा दे 
सारे शिकवे-गिले

शहरो में जब शाम होती है
सुबह समझकर निकलते है घर से लोग 
ऐसे ही तुम भी निकला करो 
घर से बाहर
कि हो कही आमना-सामना
हमारा-तुम्हारा 
-सोचकर

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

जाते वक्त

उसने मुड़कर देखना भी उचित ना समझा 
जाते वक्त 

और ना ही समझाके गया कि 
ये प्यार नही कुछ और है 
पागलपन जैसा 

फिर 
वो जो सर पर से आसमान जैसे गुजरा 
वो क्या था

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

नही भागना मुझे !

चलो भाग चलते है कही..

बहुत घुट-घुटकर जिया हमने 

बहुत खयाल रख लिया 
अपनो का भी 
लोगो का भी 

लोग कह रहे है -
जमाना बदल रहा है
विजातीय शादी-विवाह शहरों 
और गाँवो में भी हो रहा है
बड़े ही धूमधाम से 

लेकिन नही 
बस कहने में हो रहा है ऐसा 

हाँ, बस तुम ना बदलना 
या मुझे छोड़ परदेस में अकेला 
ना भाग जाना
ऐसा होता है बहुत ज्यादा 
परदेस में 

लेकिन बाबू की याद आयेगी 
अम्मा मना लेगी हिया को 
लेकिन भईया का गुस्सा 
नही बाबा नही भागना मुझे !

रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

बुधवार, 24 जुलाई 2019

दिल खोलकर हँसता हूँ कि

दिल खोलकर हँसता हूँ 
कि सब गम चिड़ियों के झुंड की तरह उड़ जाये 

लेकिन एक-दो ऐसी भी चिड़िया है 
जो जँगले पे 
मेरे दिल के 
घर बनाकर रहने लगी है 

उन्हें उड़ाना भी नही बनता मुझसे
ना ही दाना खिलाना 

सुबह-शाम वो इतना खुश होकर चहकती है कि 
मेरी नींद, मेरा चैन दरकने लगता है 
खण्डहर वाले मकान में आये झंझावात से गिरने ही वाली दीवार की तरह

कविता - रवीन्द्र भारद्वाज

चित्र - गूगल से साभार


सोचता हूँ..

सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो  बहार होती बेरुत भी  सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना  ज्यादा मायने नही रखता यार !  यादों का भी साथ बहुत होता...