बुधवार, 16 जनवरी 2019

बतियाना बहुत जरूरी हो गया हैं

गूगल से साभार 
वो भोजन पकाने में मशगूल रहती हैं 

मैं कविता रचने में 

बच्चे खेलने में ..

ऐसे बहुत दिन से चल रहा हैं 
थोड़ा पास बैठकर 
साथ-साथ 
बतियाना बहुत जरूरी हो गया हैं
- रवीन्द्र भारद्वाज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सोचता हूँ..

सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो  बहार होती बेरुत भी  सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना  ज्यादा मायने नही रखता यार !  यादों का भी साथ बहुत होता...