शनिवार, 10 नवंबर 2018

बीत गया दीपो का पर्व


गूगल से साभार
हर्षो-उल्लास का पर्व
दीपावली
बीत गयी

बीत गया
दीपो का पर्व
कुछ संदेश देकर
यू कि
अंधियारा अब ना रखना
अपने ह्दय में

मित्रवत व्यवहार करना
हरकिसी से

जीवन में ख़ुशी के रंग भरो
रंगोली के जैसे
कि देखते ही तुम्हे
हर कोई चहकके बोले
तू तो बड़ा मनभावन है रे !
Art by Ravindra Bhardvaj

2.
याद रख 
अच्छाई का वास होगा हर जगह
और बुराई का नाश होगा हर तरफ से, हर तरह से

मर्यादा पुरुषोत्तम राम जो
बैठे है तुम्हरे नईयां में
ओ निषाद भईयां !
-रवीन्द्र भारद्वाज

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

वो दिन थे !

शायद
वो दिन थे बसंत के
चाँदनी रात की
और हल्की-हल्की बरसात की, दिन थे वो !

उनदिनों
कुछ कर गुजरना था
मर-मिटना था
गर तुम नही मिलती तो..

खैर
मिली भी तो
मुद्दत बाद

अबतक
मेरा जोश और जुनून मर चुका था

इस वजह से
तुम्हे पाने की चाहत नही मरी कि
तुम मुझसे प्यार नही करती
बल्कि इस वजह से कि
मै ही केवल तुमसे प्यार करने लगा था..

काश ! तुम करी होती मुझसे प्यार
और प्यार का इकरार..

तो बहुत कुछ कहने, सुनने और करने में आसानी होती
रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज


मंगलवार, 6 नवंबर 2018

गरीब का धनतेरस और दीवाली


गूगल से साभार 


धनतेरस

और दीवाली
मनायां जायेंगा
तुम्हारे यहाँ..

धनतेरस को छोड़िये
दीवाली हो ही जायेंगा 
(जिसदिन आयेगा)
हमारे यहाँ.
- रवीन्द्र भारद्वाज 

सोमवार, 5 नवंबर 2018

नदी थी वो


नदी थी वो
मुझमे से उदगम प्रेम
ले चली थी

बही थी
साथ-साथ
कुछ दूर

कुछ दूर बाद ही
वो मुड़ गयी

तोड़कर प्रेम की जलधारा।
रेखाचित्र व कविता -रवीन्द्र भारद्वाज 

शनिवार, 3 नवंबर 2018

मुझे बहुत ही अच्छा लगता है..


सर्दी की धूप
और तुम

दोनों की आग़ोश में रहना
मुझे बहुत अच्छा लगता है..

मुझे बहुत कुछ और भी अच्छा लगता है
जैसे-
तुमसे बातें करना
तुम्हारी तारीफ़े सुनना
तुम्हारे कॉलेज से लौटने का इंतजार करना..
रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

मुझे बस तेरी फ़िक्र है !


मुझे
बस तेरी फ़िक्र है !
वरना मर-खप गई होती मै कबकी..

तू मेरे बिना कैसे जियेगा..
जान जब मुझमे बसती है तेरी !

तू मेरी जुदाई कैसे सहता होगा
यह सोचते ही..
कपकपाँ जाती है मेरी रुहे...
रेखाचित्र व कविता - रवीन्द्र भारद्वाज 

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

मैं कोई आज से तन्हा थोड़े न हू !


नदी रुठ जाएंगी तो
गति टूट जाएंगी..

मैं कोई आज से तन्हा थोड़े न हू !
तुम छोड़ जाओगे तो
और तन्हा हो जायेगे
बस इतना ही।
रेखाचित्र व कविता - रवींद्र भारद्वाज 

सोचता हूँ..

सोचता हूँ.. तुम होते यहाँ तो  बहार होती बेरुत भी  सोचता हूँ.. तुम्हारा होना , न होना  ज्यादा मायने नही रखता यार !  यादों का भी साथ बहुत होता...